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ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान की सच्चाई | History of Thugs of Hindustan in Hindi

ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान का इतिहास | History of Thugs of Hindustan in Hindi

“ठग” शब्द का उपयोग हर भाषा में गलत अर्थों में ही  किया जाताहैं,जैसे धूर्त,हत्यारा,लूटेरा या चोर इत्यादि,किन्तु इस शब्द की उत्पति और इसका ग्लोबल भाषा के रूप में पहचानी जाने वाली “अंग्रेजी” के शब्दकोश तक का सफर बेहद रोचक हैं. इन दिनों  “ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान” नाम की फिल्म के कारण ये शब्द फिर से चर्चा का विषय हैं. लेकिन ठग्स के साथ हिन्दुस्तान शब्द का जुड़ना किसी भी भारतीय के लिए थोडा कम स्वीकार्य हैं किन्तु इसके अस्त्तिव और अर्थों को नकारा भी नहीं जा सकता,इसलिए ही इस शब्द का विश्लेषण, वो भी हिंदुस्तान के परिप्रेक्ष्य में करना जरूरी हो जाता हैं.

Thugs of Hindustan

विश्व पटल परठगशब्द की पहचान  

“ठग्स ऑफ हिंदुस्तान”  फिल्म का आधार एक अंग्रेजी उपन्यास “कन्फेशन ऑफ ठग्स” को माना जा रहा हैं हालांकि इस फिल्म के डाइरेक्टर विजय कृष्ण आचार्य ने इस बात से इनकार किया हैं,और उनका भी यही कहना हैं की शायद “ठग” शब्द के कारण ही नॉवेल और फिल्म को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा हैं. लेकिन ये सच हैं कि चाहे अंग्रेजी उपन्यास हो या फिल्म दोनों का बैकग्राउंड “ठग” ही हैं. नावेल के अनुसार 1831  के आस-पास के समय में भारत में एक विशेष जाति हुआ करती थी,जिन्हें ठग कहा जाता था और उनका भयानक आतंक था. ये नावेल 1839 में पब्लिश हुई थी और 1873 में इसे रिप्रिंट किया गया. इसके ऑथर का नाम फिलिप मीडोज़ टेलर था. इस तरह उपन्यास और फिल्म दोनों जगह “ठग” शब्द को अंग्रेजों के मतानुसार ही विश्लेषित किया गया हैं और ठग का संबंध  भारत की एक जनजाति से हैं,ये समझाया गया हैं. लेकिन क्या सच में कोई ठग नाम की जनजाति तब थी,जिनका सामना अंग्रेजों ने किया था,या जिन्होंने 18 वी शताब्दी के भारत में किसी प्रकार का उत्पात मचा रखा था??

वास्तव में अंग्रेजों को ये बहुत जल्द समझ आ गया था कि भारत कई राज्यों में बंटा हुआ ऐसा देश हैं जहां पर एक इलाके से दुसरे तक पहुचने के लिए ना साधन हैं ना ही कोई अन्य प्रकार का कम्युनिकेशन हैं,लेकिन भारतीयों का धर्म उन्हें जोड़े रखता हैं,जिसमें भी एक अलिखित और अनौपचारिक वर्गीकरण हैं जो कि हर क्षेत्र में एक समान हैं. इसके लिए अंग्रेजों ने सबसे पहला जो काम किया था वो समाज को जाति के आधार पर तोडना,इसके लिए उन्होंने जातियों का डोक्युमेंटेशन करना शुरू किया,और बाद में तो उन्होंने जनगणना तक करवाई. इससे पहले ही प्राथमिक विश्लेषण से अंग्रेजों को दो तरह की बात पता चली-

उन्होंने  देखा कि हर राज्य में एक राजा का शासन होता हैं,और मुख्य शहर से थोड़ी दूर पर कुछ आदिवासियों की बस्ती होती हैं जो राजा के नियंत्रण में नहीं होती, वो प्रकृति पर निर्भर करती हैं और अपने भरन-पोषण के लिए जंगली संपदा का उपयोग करती हैं,लेकिन किसी को हानि नहीं पहुंचाती. राजा  के नियंत्रण वाले क्षेत्र में  काम करने वालों के विभिन्न वर्ग होते हैं. कुछ मुगलों से संघर्ष या उनकी गुलामी के चलते हर शहर या हर नगर में एक स्थायित्व आ चूका है, जिससे ये वर्गीकरण स्पष्ट देखा जा सकता हैं लेकिन जो बस्ती शहर से दूर रहती हैं,वो किसी भी शासक के प्रभाव में नहीं रहती, और ना वो नगरीय कामों में हस्तक्षेप करती हैं. ऐसे में नगरो/गाँवों में रहने वाले कई समुदायों को पता भी नहीं होता कि कोई आदिवासी जनजाति है या उनके नगर/गाँव के बाहर जंगलों में भी कोई समाज रहता हैं. ये केवल उन लोगों को पता होता हैं जो किसी कार्यवश अपना शहर छोड़ते हैं. इन सबसे ऊपर भारतीय समाज में अंध-विश्वासों ने अपनी गहरी जगह बना रखी हैं, जैसे पेड़ों पर भूतों का वास होना जंगलों में किसी अघोरी या मानवभक्षी का रहना इत्यादि. तो ये सब मिलाकर अंग्रेजों को इसमें से अपने लाभ के कारण खोजकर इन मासूम जनजातियों के जीवन और वन संपदा में घुसपैठ करनी थी.

इस तरह अंग्रेजों ने इस जातियों का अपने अनुसार ही कुछ वर्गीकरण तय किया,जिसमें उन्होंने कुछ को आपराधिक जनजाति तक कहा.

अंग्रेजों द्वारा अपराधिक जनजातियों का निर्धारण

अंग्रेजों ने पंजाब में सांसी, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भील, दक्षिण हरियाणा में मेवाती और राजस्थान में  रावत-मेहरात जैसी कई जातियों को क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर दिया था. ब्रिटिश समय में सांसियों को क्रिमिनल ट्राइब एक्ट 1871 के अंतर्गत रखा गया.इस तरह अंग्रेजों ने सदियों तक के लिए एक संशय या जिसे तथ्य मान सकते हैं,का बीजारोपण कर  दिया था कि भारत में बहुत सी जातियां चोर,लूटेरे या डाकू की थी,जिनमें पिंडारी,सांसी जैसी कई जातियों के नाम उत्तर से लेकर दक्षिण तक अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं. और ऐसा नहीं हैं कि अंग्रेजों ने  ऐसा कोई एक क्षेत्र में किया हो, इसके कारण आज भी भारत के विभिन्न राज्यों में  कई जातियां ऐसी हैं जिनको लूटेरा माना जाता हैं.

लेकिन सच तो ये हैं कि नगरों/ग्रामों में आधिपत्य हासिल करने के बाद जब अंग्रेजों ने जंगलों का रुख किया तो उन्हें इन जनजातियों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा,इसका उदाहरण इतिहास में विभिन्न जनजातियों का अंग्रेजों से हुआ संघर्ष हैं,जिनमें मुख्य निम्न हैं-

समय

स्थान

जनजाति

1774-79

बस्तर,छत्तीसगढ़

हल्बा ट्राइब

1778

छोटा नागपुर

पहडीया सरदार

1784-85

महाराष्ट्र

कोली महादेव ट्राइब

1794-95

तामरस

1812

वायनाड

कुरीच्या ट्राइब

1850

उड़ीसा

खोंड

1855

संतल

1857-1858

भील

1860

त्रिपुरा

लुशाई

1862

आन्ध्र

कोय

1860-60

जेंशिया हिल्स (नार्थ ईस्ट इंडिया)

सिंटेंग

इनसे साफ समझ आता हैं कि अंग्रेजों ने नगरीय सभ्यता को तो सख्ती से जमीदार-कृषक,माइल-मजदूर और विभिन्न जातियों में बांटकर शासन हासिल कर लिया था,  लेकिन भारत की मुख्य आर्थिक संपदा तो यहाँ के जंगलों में वास करती थी. जिस पर जनजातियों का अधिकार था,और वो इतनी सभ्य या नासमझ नहीं थी कि आसानी से अंग्रेजों को अपने अधिकारों का हनन करने देती. इसके लिए अंग्रेजों ने उनके विरुद्ध माहौल बनाना शुरू किया.

अंग्रेजों का इन जनजातियों को अपराधी घोषित करने का संभावित कारण     

अंग्रेज सडक बनाकर जब भी आगे बढने की सोचते तो उनका मुख्य सामना इन जातियों से ही होता जो प्रत्येक पेड़ को अपना भगवान मानती थी,धनुर्विद्या के साथ ही बाहुबल और छुपकर वार करने में कुशल इन जातियों से जीतना अंग्रेजों के लिए मुश्किल हो चला था,इसलिए उन्होंने इनसे निबटने के लिए कूटनीति का उपयोग करना शुरू किया.

उन्होंने सबसे पहले पता लगाया कि इस जाति का सांस्कृतिक आधार क्या हैं?? मतलब ये कैसे रहती हैं? कौन इनका आराध्य हैं? और कैसे जीवन यापन करती है? तो अंग्रेजों को पता चला कि ज्यादातर वनवासी जातियां माँ काली की उपासक हैं,और काली माँ विध्वंसक देवी हैं,यहाँ उन्हें इनके खिलाफ पहला हथियार मिला.

इस तरह ये माना जा सकता हैं कि ग्रामीण/शहरी क्षेत्रों में रहने वाले जहाँ ये बात नहीं समझ पा रहे थे कि अंग्रेजों की नीयत क्या हैं,वहीं प्रकृति को और अपनी जन्मभूमि को समर्पित और अपने आराध्य के अलावा किसी का शासन ना मानने वाले ये लोग इस बात को अच्छे से समझ गये थे कि अंग्रेज आखिर क्या चाहते हैं. इसलिए जब भी अंग्रेज इनके इलाके में घुसने की कोशिश करते,ये उन्हें रोक लेते.

ठग शब्द की उत्पति

ये हर जगह लिखा मिल सकता हैं कि 18वी शताब्दी में ठगों का आतंक था जिसे स्लीमन नाम के अंग्रेज ने समाप्त किया. लेकिन यदि ये सच हैं तो ये सवाल बनता हैं कि अंग्रेजों को अपनी डिक्शनरी में ठग शब्द को शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी होगी?अंग्रेजों ने जमीदारों,किसानों,मजदूरों और अन्य कई वर्गों पर तो आधिपत्य हासिल कर लिया था लेकिन उनके लिए इन असभ्य कहलाई जाने वाली जातियों को अपने में शामिल करना या अधीन करना मुश्किल हो रहा था. क्योंकि ऐसा कोई कारण अंग्रेजों के पास नहीं था कि वो उन्हें झुका सके उस पर अंग्रेजों को इनके पास उपलब्ध वन-संपदा भी चाहिए थी. इसलिए उन्होंने अपनी सबसे ज्यादा उपयोग में ली जाने वाली नीति अपनाई,उन्होंने इनके विरुद्ध दुष्प्रचार शुरू किया. उन्होने बताया कि “इस वर्ग के लोग राहगीरों के समूह के साथ पहले –घुल मिल जाता हैं फिर रूमाल से उनका गला घोंटकर मार देते हैं,ये रुमाल माँ कालि की शक्ति का प्रतीक हैं इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में रक्त की बूंद भी नहीं बहाई जाती,फिर शव को जमीन खोदकर गाड दिया जाता हैं, प्राप्त हुयी संपदा को मन्दिरों में अर्पित किया जाता हैं,और इनका जीवन बहुत ही गुप्त होता हैं, ये समुदाय सिर्फ 6 महीने ये काम करता हैं बाकि समय अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन व्यतीत करता हैं”.

ऐसी घटनाएं बढ़ने पर स्लीमन को इससे निपटने के लिए इस डिपार्टमेंट का हेड बनाया गया और उसने जमशेदपुर में अपना हेड क्वार्टर बनाया,और वहाँ से ठगों के खिलाफ कारवाही शुरू की.

तथाकथित ठगों की देशभक्ति (कहानी)

पिंडारियों के दमन की बात जंगल में आग की तरह फ़ैल चुकी थी,पिंडारी किसी भी विदेशी सत्ता के सामने कभी नहीं झुके थे,उन्होंने पानीपत में  मुगलों के खिलाफ मराठों का साथ दिया था,लेकिन हार के बाद वो बिखर गये और स्वतंत्र गुट बनाकर रहने लगे. उन्होंने कभी अंग्रेजों का समर्थन किया इसी का परिणाम था कि उन्हें आतंकवादी बना दिया था. समुदाय के मुखिया ने चिंता में अपनी बात सबके सामने रखी, उन्होने कहा ये हर वो जाति को ऐसे ही खा जायेंगे जो इनके रास्ते में आयेगी. बुजुर्ग की चिंता का जवाब एक 13 वर्षीय बालक से मिला- बालक ने कहा “ उनके पास हजारों आधुनिक हथियार हो हमारे पास संकल्प का वो हथियार हैं जो हमने जन्म के साथ ही माँ प्रकृति से लिया था कि शरीर में जब तक अंतिम बूंद भी बची होगी तब तक हम इसकी रक्षा करेंगे”. यहाँ के छोटे से छोटे पत्ते की जिम्मेदारी भी हमारी हैं, प्रवाहित होती नदी के जल के प्रति हमारा सम्मान स्थिर हैं, इस वन-संपदा की जमीन पर उन्हें अपनी जड़ें नहीं जमाने दे सकते,यहाँ पर हमें फल देने वाले वृक्षों की पवित्र जड़ें हैं,इसमें किसी भी बाहरी आक्रान्ता का प्रदूषण स्वीकार्य नहीं हैं,और इस युद्ध में स्वयं माँ काली हमारे साथ हैं.

स्लीमन ने हमारे वृक्षों को काटकर यहाँ पर सड़क बनाने की सोची हैं,वो वन संपदा का उपभोग सुविधाजनक बनाना चाहता हैं,उसने चन्दन को हाथ लगाया हैं, हाथियों को नुकसान पहुचाया हैं,शिकार की प्रवृति और फलों को नित्य ही शहर ले जाने के लिए वो कई तरह के कार्यक्रम बनाकर किसी शहरी को मुर्ख बना सकता हैं,हमें नहीं. यदि उसके सोचे अनुसार इसी तरह से हमारी माँ का उपभोग हुआ तो कुछ ही वर्षों में हम अनाथ हो जायेंगे,इसलिए बेहतर हैं कि हर वो श्वांस जिसका लक्ष्य हमारा विनाश हो उसी का विनाश हो जाए. उदास,चिंतित और नीरस से दिखने वाले समुदाय में एक उत्साह की लहर दौड़ गई लेकिन हम प्रकृति के बनाये नियमों से प्रतिबद्ध हैं,हम किसी भी इंसान का रक्त तक नहीं बहा सकते,मानव हत्या तो बहुत ही बड़ी बात हैं. बुजुर्ग मुखिया की बात सुनकर बालक को कोई जवाब नहीं समझ आया.  पिछले कई दिनों से कभी हल्के विषैले तीरों के प्रहार से तो कभी पत्थर वर्षा से तो कभी पेड़ों पर फंदे  बनाकर अंग्रेजों में जंगल में प्रवेश से रोकने वाले उस बालक ने अपने हमउम्र बच्चों की टोली से इस दिशा में कुछ सख्त काम करने का निर्णय किया. इस तरह से उस बाल-टोली ने माँ काली के आदेश से हत्या की पहली योजना बनाई,इसके लिए पीले रुमाल का उपयोग और जंगल के प्रवेश द्वार से पहले ही काम को खत्म करने का निश्चय किया गया.

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों  तक जब अपने सिपाहियों की हत्या की सूचना पहुंची तो उन्हे वो कारण मिला जिसका उन्हें इंतज़ार था,वास्तव में कम्पनी को ब्रिटिश सरकार और अन्य देशों से इस बात के लिए आलोचना का सामना करना पड रहा था कि वो भारत में ना केवल यहाँ की प्रकृति का भी शोषण कर रहे हैं बल्कि निर्दोष जनजातियों को भी मार रहे हैं. अब कंपनी ने अपना पक्ष रखकर ये सिद्ध किया कि ये जनजाति हर उस अंग्रेज व्यापारी को जंगलों में लूटती हैं जो एक शहर से दुसरे शहर व्यापार के उद्देश्य से यात्रा करते हैं. इस तरह उन्होंने ना केवल अपना दुष्ट उद्देश्य पूरी दुनिया से छूपा लिया बल्कि इस संघर्षरत जनजाति के लिए “ठग” शब्द का भी उपयोग किया,जो कि वास्तव में भारतीय शब्द था. अंग्रेजों और वीर जाति के मध्य चले लंबे संघर्ष के बाद भी कुछ सार्थक परिणाम नहीं निकला,और अंग्रेज अपनी मंशा में कामयाब हुए. उन्होंने अपने पक्ष में साहित्यिक शुरुआत करते हुए एक ऐसा इतिहास रचा जिसने वीर और बेकसूर प्रकृति-पुत्रों को मानवता का विरोधी घोषित कर दिया, और सदियों तक के लिए इन्हें “ठग” शब्द दे दिया.

घने जंगल के बीच बहती वो नदी साक्षी थी

उस रक्त की, जो उसके पुत्रों के शरीर से बहा था….

आस-पास बसे पेड़ों से फलों के जैसे ही,

एक-एक शव उसके आंचल में गिर रहा था,

हालांकि! इससे पहले भी “धाय” की आवाज़ से

कुछ पंछी, उड़ने के स्थान पर

गिरकर बह जाते थे उसके साथ….

लेकिन उसने कभी उफ्फ तक ना कहा था,

सदियों से पूजी जाने वाली ने

कब ऐसा प्रदूषण सहा था?? कब ऐसा प्रदूषण सहा था??