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बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय | Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi

बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय (Bal Gangadhar Tilak Biography in Hindi)

भारत के इतिहास के पन्नों को पलटा जाये, तो कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये. उन्हीं में से एक हैं बाल गंगाधर तिलक, जिनका नाम लेने में आज भी बहुत गर्व होता है. वे आधुनिक भारत के एक प्रमुख वास्तुकार थे. वे भारत के लिए स्वराज / स्वयं के नियम के प्रमुख समर्थक थे. उनका कथन था कि –‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैं, और मैं इसे पा कर रहूँगा’. इन्होंने भारत के संघर्ष के दौरान एक क्रांतिकारी के रूप में कार्य किया. उन्हें उनके समर्थकों ने सम्मानित करने के लिए ‘लोकमान्य’ का ख़िताब दिया. वे एक महान विद्वान व्यक्ति थे, जिनका मानना था कि आजादी एक राष्ट्र के कल्याण के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है.

Bal Ganga Dhar Tilak

जन्म एवं परिचय (Birth and Introduction)

क्र. म.

(s.No.)

परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1. पूरा नाम (Full Name) बाल गंगाधर तिलक
2. अन्य नाम (Other Name) केशव गंगाधर तिलक, लोकमान्य तिलक
3. जन्मतिथि (Birth Date) 23 जुलाई, 1856
4. जन्म स्थान (Birth Place) रत्नागिरी, महाराष्ट्र
5. राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
6. प्रसिद्धी (Famous As) भारतीय शिक्षक
7. पेशा (Occupation) लेखक, राजनेता, स्वतंत्रता सैनानी, समाज सुधारक, शिक्षक, वकील
8. धर्म (Religion) हिन्दू
9. जाति (Caste) मराठा
10. संस्थापक / सह – संस्थापक (Founder / Co – Founder) डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी, आल इंडिया होम रूल लीग, मराठा, केसरी
11. मृत्यु (Death) 1 अगस्त, 1920
12. मृत्यु स्थान (Death Place) मुंबई, महाराष्ट्र
13. मृत्यु के समय उम्र (Died At Age) 64 वर्ष
14. राशि (Zodiac Sign) कर्क
15. राजनीतिक पार्टी (Political Party) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
16. आंदोलन (Movement) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
17. राजनीतिक विचारधारा (Political Ideology) राष्ट्रवाद एवं अतिवाद
18. शहीद स्मारक (Memorial) तिलक वाडा, रत्नागिरी, महाराष्ट्र

परिवार एवं शुरूआती जीवन (Family and Early Life)

1. पिता का नाम (Father’s Name) गंगाधर तिलक
2. माता का नाम (Mother’s Name) पार्वती बाई
3. पत्नी का नाम (Spouse’s Name) तापी बाई (सत्यभामा बाई)
4. बच्चों के नाम (Children’s Name) रमा बाई वैद्य, पार्वती बाई केलकर, विश्वनाथ बलवंत तिलक, रामभाऊ बलवंत तिलक, श्रीधर बलवंत तिलक और रमाबाई साणे

जब इनका जन्म हुआ तब इनका नाम केशव गंगाधर तिलक रखा गया था. वे एक ऐसे परिवार से संबंध रखते थे, जोकि मराठी चित्पावन ब्राम्हण परिवार था. उनके पिता एक स्कूल में शिक्षक और साथ ही संस्कृत के विद्वान थे. तिलक जी के शुरूआती जीवन में वे एक प्रभावशाली भूमिका निभाते थे. तिलक जी ने अपनी अधिकांश शुरूआती शिक्षा घर पर ही अपने पिता से प्राप्त की. तिलक जी बेहद बुद्धिमान एवं शरारती थे, किन्तु उन्हें उनके शिक्षक पसंद नहीं थे. जब वे युवा हुए, वे अपने स्वतंत्र विचारों और मजबूत राय में समझौता नहीं करते थे, इसलिए वे अपने उम्र के अन्य लोगों से काफी अलग थे. सन 1871 में जब वे 16 साल के थे, तब उनके पिता की मृत्यु हो गई. उनके पिता की मृत्यु के कुछ माह पहले ही उनका विवाह तापी बाई से हुआ था, जिनका नाम बाद में सत्यभामा बाई कर दिया गया. इस तरह से इनका शुरुआती जीवन बीता.

शिक्षा एवं करियर (Education and Career)

तिलक जी एक बुद्धिमान छात्र थे, वे बचपन से ही वे स्वाभाव में सच्चे और सीधे इंसान थे. उनका दृष्टिकोण हमेशा से ही अन्याय के खिलाफ होता था, उनकी इसके प्रति बचपन से ही स्वतंत्र राय थी. सन 1877 में संस्कृत और गणित में इन्होने पुणे के डेक्कन कॉलेज से स्नातक (बी ए) की डिग्री प्राप्त की. उसके बाद उन्होंने मुंबई के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी का अध्ययन किया और सन 1879 में उन्होंने अपनी कानून की डिग्री प्राप्त की.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पुणे के एक प्राइवेट स्कूल में अंग्रेजी और गणित पढ़ाना शुरू किया. किन्तु स्कूल के अधिकारियों के साथ उनकी सहमति नहीं होने के कारण उन्होंने सन 1880 में स्कूल में पढ़ाना छोड़ दिया और वे राष्ट्रवाद पर जोर देने लगे. वे उन युवा पीढ़ियों में से एक थे, जोकि आधुनिक कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारतीयों की पहली पीढ़ी थी.

डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना (Deccan Education Society Founder)

तिलक जी ने अंग्रेजों द्वारा भारत में कराई जा रही शैक्षिणक प्रणाली का कठोरता से विरोध किया. इसके साथ ही उन्होंने ब्रिटिश छात्रों की तुलना में भारतीय छात्रों के साथ हो रहे असमान व्यवहार के खिलाफ भी विरोध किया, और भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए इसकी पूरी तरह से उपेक्षा की. उनके अनुसार भारतीयों को दी जाने वाली शिक्षा पर्याप्त नहीं थी, और भारतीय इससे अनजान और अज्ञानी बने रहते थे. इसलिए उन्होंने सन 1880 में भारतीय युवाओं के लिए राष्ट्रवादी शिक्षा को प्रेरित करने एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के उद्देश्य से अपने कॉलेज के साथी विष्णु शास्त्री चिपलूनकर, महादेव बल्लाल नामजोशी और गोपाल गणेश अगरकर के साथ मिलकर डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की शुरुआत की.

इस सोसाइटी की स्थापना एक नई प्रणाली बनाने के लिए की गई थी, जिसमें भारतीय संस्कृति पर जोर देते हुए युवाओं को भारतीय राष्ट्रवाद के विचारों के बारे पढ़ाया गया. इस सोसाइटी ने सन 1885 में माध्यमिक शिक्षा के लिए न्यू इंग्लिश स्कूल और उच्च शिक्षा के लिए फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना की. डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी अभी भी पुणे में फर्ग्यूसन कॉलेज की तरह संस्थान चलाती है. उन्होंने धार्मिक एवं सांस्कृतिक पाठ्यक्रम पर जोर देने के अलावा स्वतंत्रता की दिशा में एक जन आंदोलन भी शुरू किया. इसके बाद उन्होंने राजनीतिक करियर की ओर कदम रखा.

राजनीतिक करियर (Political Career)

तिलक जी ब्रिटिशों के शासन को हटाकर भारतीय ऑटोनोमी के लिए आंदोलन चलाने के लिए अपने राजनीतिक करियर की ओर चल दिए. गाँधी से पहले, वे सबसे ज्यादा व्यापक रूप से जाने माने भारतीय राजनेता थे. उन्हें उस समय का एक कट्टरपंथी राष्ट्रवादी माना जाता था, लेकिन वे एक समाजिक रुढ़िवादी थे. सन 1890 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए. उन्होंने इस पार्टी के दृष्टिकोण का विरोध किया, जोकि स्व-शासन के लिए लड़ाई की ओर नहीं था. उनका कहना था कि ब्रिटिशों के खिलाफ अपने आप में सिंपल संवैधानिक आंदोलन करना व्यर्थ है. इसके बाद वे प्रमुख कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के खिलाफ खड़े हुए. वे अंग्रेजों को दूर करने के लिए एक सशस्त्र विद्रोह चाहते थे. लार्ड कर्ज़न द्वारा किये गये बंगाल के विभाजन के समय तिलक जी ने स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार का दिल से समर्थन किया था. किन्तु उनके द्वारा की गई इस कोशिश ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और आंदोलन के अंदर कई विवादों को जन्म दिया.

इनके और पार्टी के दृष्टिकोण में इस अंतर के कारण तिलक जी को एवं उनके समर्थकों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के चरमपंथी (एक्सट्रीमिस्ट) विंग के रूप में जाना जाने लगा. हालाँकि तिलक जी के द्वारा किये गये प्रयासों का उन्हें अरबिंदो घोष, वीओ चिदंबरम पिल्लई और मुहम्मद अली जिन्ना सहित कई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं से समर्थन प्राप्त हुआ. इसके अलावा बंगाल के राष्ट्रवादी बिपिन चन्द्र पाल और पंजाब के लाला लाजपत राय द्वारा उन्हें विशेष समर्थन प्राप्त था, जिसके चलते उन्हें ‘लाल – बाल – पाल’ के रूप में लोग जानने लगे. सन 1907 के राष्ट्रीय सत्र में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के दोनों वर्गों (कट्टरपंथी एवं मध्यम) के बीच भारी विवाद हुआ. इस विवाद का परिणाम यह निकला कि कांग्रेस को 2 भागों में विभाजित होना पड़ा.

क्रांतिकारी के रूप में (As a Revolutionary)

तिलक जी ने देशभक्ति के साथ भारतियों को प्रभावित किया, उन्होंने कांग्रेस को एक जन आंदोलन बना दिया. उन्होंने एक प्रसिद्ध नारा दिया ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं और मैं इसे पा कर रहूँगा’. तिलक जी आधुनिक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख में से एक थे, उन्होंने भारत के भावी क्रांतिकारीयों के लिए प्रेरणा के रूप में कार्य किया. साथ ही वे सार्वजनिक मामलों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया करते थे. तिलक जी का एक क्रांतिकारी के रूप में जन्म हुआ था. उन्होंने देश में अलग तरह की राजनीति को जन्म दिया, उनके लिए राजनीती का मतलब पीड़ा और बलिदान था. एक तरफ ब्रिटिश सरकार उनके द्वारा किये गये कार्यों से बहुत परेशान थी, इसलिए उन्होंने उन्हें एक नया नाम दिया ‘भारतीय अशांति का जनक’, तो दूसरी ओर उनके समर्थकों ने सम्मान देने के लिए उन्हें ‘लोकमान्य’ नाम दिया. और वे तब से ‘लोकमान्य तिलक’ नाम से जाने जाने लगे. उन्होंने देश के लोगों को देशभक्त और निडर बना दिया था. इस प्रकार वे भारत के एक महान व्यक्तित्व बन गये.

बाल गंगाधर तिलक का कारावास (Imprisonment in Mandalay)

एक बार तिलक जी के साथी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस ने मिलकर डगलस किंग्सफोर्ड के मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट की हत्या करने की साजिश रची. किन्तु इसमें मजिस्ट्रेट को कुछ नहीं हुआ और उनके स्थान पर दो महिलाएं मारी गई. इस वारदात के बाद वे दोनों पकड़े गये, पकड़े जाने पर प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली, किन्तु इसमें बोस को फांसी की सजा सुना दी गई. तिलक जी ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ के माध्यम से क्रांतिकारियों का बचाव किया और तुरंत स्वराज / स्व-शासन की मांग की. जिससे सरकार ने उन पर राजद्रोह का चार्ज लगाया. और अंत में एक विशेष जूरी ने उसे 7:2 बहुमत से दोषी ठहराया. उन पर 1000 रूपये का जुर्माना लगाया गया और उन्हें मंडले, बर्मा (वर्तमान में म्यांमार) में सेवा के लिए सन 1908 से 1914 तक 6 साल की जेल की सजा सुनाई गई.

कैद होने पर, उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन पर अपने विचारों को और विकसित करने के लिए पढ़ना और लिखना जारी रखा. उन्होंने जेल में ‘गीता रहस्य’ किताब लिखी. जोकि बहुत बिकी और उससे मिलने वाले पैसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में दान कर दिए गये. उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी जोकि ब्रिटिश सरकार को पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने उनके समाचार पत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाने की कोशिश की. जब वे मंडले कैद में थे, उस दौरान पुणे में उनकी पत्नी सत्यभामा की मृत्यु हो गई.

पूरे भारत में होम रूल लीग (All India Home Rule League)

जेल की सजा पूरी करने के बाद जब वे वापस आये, तब सन 1915 में तिलक जी ने देखा कि प्रथम विश्व युद्ध के चलते भारत की राजनीती तेजी से बदल रही थी. उनके जेल से रिहा होने के बाद लोगों ने उसका उत्सव मनाया. इसके बाद उन्होंने एक शांत दृष्टिकोण के साथ राजनीति में दोबारा कदम रखा. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में फिर से शामिल हुए थे, लेकिन वे कांग्रेस के बटवारे के चलते दोनों गुटों के बीच सुलह कराने की कोशिश में असमर्थ रहे. फिर उन्होंने यह कोशिश करना छोड़ दिया. अपने साथियों के साथ फिर से एक जूट होने का फैसला करते हुए तिलक जी ने सन 1916 में युसूफ बैप्टिस्टा, एनी बसेंट और मुहम्मद अली जिन्नाह के साथ मिल कर पूरे भारत में होम रूल लीग की स्थापना की.

इसमें उन्होंने स्व-शासन की मांग की. इसके लिए उन्होंने गाँव – गाँव जाकर किसानों और वहां के स्थानीय लोगों से स्व-शासन के लिए आंदोलन में शामिल होने का आग्रह किया. अप्रैल 1916 तक इस लीग में 1400 लोग ही शामिल हुए थे, किन्तु सन 1917 में यह आंकड़ा बढ़कर 32,000 तक पहुँच गया था. तिलक जी ने अपना यह होम रूल लीग महाराष्ट्र, केन्द्रीय प्रांत, कर्नाटका और बेरार क्षेत्र में शुरू किया. इसके बाद इसे पूरे भारत में शुरू किया गया.

समाज सुधारक के रूप में (As a Social Reforms)

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने देश की सेवा के लिए समर्पित होने का फैसला किया. उन्होंने अपने पूरे जीवन में महिलाओं की शिक्षा और उनके विकास के लिए कई कार्य किये. तिलक जी ने देश की सभी बेटियों को शिक्षित करने, और 16 वर्ष की आयु तक उनका विवाह नहीं करने के लिए लोगों को प्रेरित किया.

लार्ड कर्ज़न द्वारा एक ऐसी रणनीति निर्धारित की गई थी, जिसमें राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर कर बंगाल का विभाजन कर दिया गया था. इस तरह की रणनीति को तोड़ने के लिए तिलक जी ने स्वदेशी आंदोलन एवं बॉयकॉट आंदोलन को प्रोत्साहित किया. इस बॉयकॉट आंदोलन में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करने वाले किसी भी भारतीय का समाज से बहिष्कार शामिल था. और स्वदेशी आंदोलन में मूल रूप से भारत में बनाये गये सामानों का उपयोग शामिल था. इससे स्वदेशी एवं बॉयकॉट आंदोलन को एक ही सिक्के के दो पहलू कहा जा सकता है. इस तरह से इन्होने समाज को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया.

बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु (Bal Gangadhar Tilak Death)

तिलक जी जलियांवाला बाग हत्याकांड की क्रूर घटना से इतने निराश हुए कि उनका स्वास्थ्य धीरे – धीरे कमजोर होता गया. अपनी बीमारी के बावजूद भी तिलक जी भारतीयों को यही कहते रहे कि जो हुआ इससे आंदोलन पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. वे आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए उत्साहित थे, लेकिन उनके स्वास्थ्य ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी. तिलक जी को मधुमेह की बीमारी थी, और उस समय वे बहुत कमजोर हो गये थे. जुलाई सन 1920 के मध्य में उनकी हालत ख़राब होती चली गई और 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हो गया. यह खबर से लोगों को बहुत दुःख हुआ, और बॉम्बे में अपने प्रिय नेता की आखिरी झलक देखने के लिए 2 लाख से ज्यादा लोग इकठ्ठे हुए. जब उनकी मृत्यु हुई तब उनकी उम्र 64 वर्ष की थी.

किताबें (Bal Gangadhar Tilak Books)

तिलक जी ने भारतीय संस्कृति, इतिहास और हिन्दू धर्म पर कई किताबें लिखीं. इन्होने सन 1893 में ‘वेदों के ओरियन एवं शोध’ के बारे में लिखा. इसके अलावा इन्होने सन 1903 में ‘आर्कटिक होम इन द वेदास’ और सन 1915 में ‘श्रीमद् भगवत गीता रहस्य’ जैसी किताबों का प्रकाशन किया.

समाचार पत्र (Bal Gangadhar Tilak Newspaper)

अपने राष्ट्रवादी लक्ष्यों के लिए जाने जाने वाले बाल गंगाधर तिलक जी ने सन 1881 में दो समाचार पत्रों का प्रकाशन किया, जोकि साप्ताहिक रूप से प्रकाशित किये जाते थे. दोनों ही समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया. इसके माध्यम से तिलक जी ने बड़े पैमाने पर शिक्षा और राष्ट्रीय जागरूकता फ़ैलाने का लक्ष्य रखा. इसके साथ ही उन्होंने इन समाचार पत्रों से लोगों के समाजिक जीवन में हस्तक्षेप करने के लिए सरकार के विचारों का विरोध भी किया.

बाल गंगाधर तिलक जी की याद में धरोहर (Bal Gangadhar Tilak Legacy)

तिलक जी की याद में पुणे शहर में एक तिलक म्यूजियम बनाया गया है, जोकि वहां के सबसे महत्वपूर्ण म्यूजियम में से एक है. यह म्यूजियम उनके निवास स्थान पुणे के नारायण पेठ क्षेत्र में स्थित, केसरी वाडा प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक में दुसरी मंजिल पर बनाया गया है. इसे गायकवाड वाडा भी कहा जाता है. इसके अलावा पुणे में ‘तिलक रंगा मंदिर’ नाम का थिएटर ऑडिटोरियम भी उन्हें समर्पित किया गया है. सन 2007 में भारत सरकार ने तिलक की 150 वीं जयंती मनाने के लिए एक सिक्का जारी किया था. उनकी याद में एक फिल्म भी बनाई गई, जिसका नाम ‘लोकमान्य : एक युग पुरुष’ था. यह फिल्म 2 जनवरी सन 2015 को रिलीज की गई थी, जोकि तिलक जी की जीवनी पर आधारित थी. इस फिल्म का निर्देशन ओम राउत ने किया था, और इसमें तिलक जी का अभिनय अभिनेता सुबोध भावे ने किया था.

रोचक तथ्य (Interesting Facts)

  • तिलक जी ने जमशेद जी टाटा के साथ मिलकर सन 1900 में को – ओप स्टोर कंपनी लिमिटेड को स्वदेशी वस्तुओं का ग्राहक बनने के लिए प्रोत्साहित किया, और उस स्टोर को अब बॉम्बे स्टोर के नाम से जाना जाता है.
  • तिलक जी की वेशभूषा की बात की जाए, तो तिलक जी अक्सर धोती और कुर्ता पहना करते थे. साथ ही उनके सर पर लाल रंग की पगड़ी हुआ करती थी. ऐसा कहा जा सकता है कि वे मराठी संस्कृति की पोशाक पहनते थे.
  • गणेश चतुर्थी का त्यौहार लोग अपने घर पर ही मनाते थे, किन्तु तिलक जी ने सन 1893 से लोगों को इस त्यौहार को सर्वजनिक एकता के साथ मनाने एवं इसे सार्वजनिक त्यौहार में बदलने के लिए प्रोत्साहित किया.
  • तिलक जी अपने बलिदान और त्याग की उच्चतम भावना के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने ‘भारत माता’ के लिए धन, आराम, परिवार, ख़ुशी और स्वास्थ्य का त्याग किया था.

अनमोल वचन (Quotes)

  • आजादी में प्रगति होती है, स्व – सरकार के बिना न तो औद्द्योगिक प्रगति संभव हैं, और न ही शैक्षिक योजना देश के लिए उपयोगी है.
  • धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं है. सन्यास लेना जीवन छोड़ना नहीं होता है. असली भावना केवल परिवार के लिए नहीं बल्कि देश के लिए मिलकर काम करने में है. इसलिए हमें पहले मानवता की सेवा की ओर कदम बढ़ाना चाहिए और उसके बाद भगवान की सेवा की ओर.
  • अगर भगवान को अस्पृश्यता के साथ रखा जाता है, तो उसे मैं भगवान नहीं कहूँगा.
  • जीवन पूरी तरह से एक ताश के खेल के समान है. सही ताश को चुनना हमारे हाथ में नहीं होता है. लेकिन उसे अच्छी तरह से खेलना हमारी सफलता सुनिश्चित करता है.
  • सफल होने के लिए आपको परिवार और दोस्तों की आवश्यकता है, लेकिन बहुत सफल होने के लिए आपको दुश्मनों और प्रतिस्पर्धियों की आवश्यकता है.
  • समस्या, संसाधनों या क्षमता की कमी के कारण नहीं होती, बल्कि इच्छा की कमी के कारण होती है.
  • हमारा देश एक पेड़ की तरह हैं जिसमें मूल जड़ स्वराज्य है और उसकी शाखाएं स्वदेशी एवं बॉयकॉट हैं.

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